Things that run through my mind, when the rest of me is struggling to run at the said speed.
Tuesday, May 17, 2011
Tuesday, March 15, 2011
Friday, February 11, 2011
विचारों की vacancy
एक किस्म की कायरता बुन ली है तुमने,
अपने विचारों में,
अपनी धारणाओं में।
स्वीकृति के भूखे इन विचारों में,
नया सा कुछ भी नहीं।
न यह क्रांति ला सकते हैं,
न समय पर अपना चिन्ह ही छोड़ सकते हैं।
ये सिर्फ चाय की टपरी पर बैठकर,
चर्चा-परिचर्चा कर सकते हैं,
सबसे सहमत हो सकते हैं,
बहती हवा के रुख में बह सकते हैं।
लेकिन अगर कोई सच्चा संकल्प लेना हो,
या किसी जज़्बे का भार उठाना हो,
तो इनके पांव कांपने लगते हैं।
अपने विचारों में,
अपनी धारणाओं में।
स्वीकृति के भूखे इन विचारों में,
नया सा कुछ भी नहीं।
न यह क्रांति ला सकते हैं,
न समय पर अपना चिन्ह ही छोड़ सकते हैं।
ये सिर्फ चाय की टपरी पर बैठकर,
चर्चा-परिचर्चा कर सकते हैं,
सबसे सहमत हो सकते हैं,
बहती हवा के रुख में बह सकते हैं।
लेकिन अगर कोई सच्चा संकल्प लेना हो,
या किसी जज़्बे का भार उठाना हो,
तो इनके पांव कांपने लगते हैं।
Tuesday, December 28, 2010
Wednesday, December 8, 2010
Tuesday, October 26, 2010
Where are the old cities?

सीढ़ी, सड़कों, दीवारों से.
गलियों, कूचों, बाज़ारों से.
आँगन और चौखट और नुक्कड़,
चारास्तों से, चौबारों से.
मंदिर तक जाते रस्ते से,जो घाट पे जा कर गिरता था.गलियों को छेड़ के जो उनके,आगे-पीछे को फिरता था.
उस छत से जिस की गोदी में,सर्दी की धूप सो जाती थी.जहाँ शाम ढले अनगिनत पतंगे,उतर समर में आती थीं.
फिर पूछा रुक-रुक कर मैंने,हाट की सब दूकानों से.जहाँ सौदा करते आये थे,कभी रुपये, कभी चार आनों से.
पर नहीं मिला, अब किसे याद,अब कौन पता दे सकता है?था शहर पुराना वैसे भी,बिक गया, कबाड़ था, अच्छा है.
Labels:
Illustration,
Old city,
Poetry,
Urban planning
Saturday, September 11, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)




